window.dataLayer = window.dataLayer || []; function gtag(){dataLayer.push(arguments);} gtag('js', new Date()); gtag('config', 'G-6CFPBX2EJR'); रहस्यमय हिंदु मंदिर

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शनिवार, 16 दिसंबर 2023

तारापीठ शक्तिपीठ, बीरभूम, पश्चिम बंगाल

बंगाली हिंदुओं के प्रमुख हिन्दू देवी तीर्थों में कालीघाट, तारापीठ शक्तिपीठ और नबद्वीप विशेष स्थान रखते हैं। 


पौराणिक इतिहास:


तारापीठ शक्तिपीठ के स्थापना की कथा मुख्यतः सतयुग की ही मानी गयी है। जब माता सति दक्षयज्ञविनाशिनी हो कर आत्मदाह कर लिया,  दुख में डूबे भगवान शिव सारे संसार मे उनकी मृत देह लिए घूमने लगे, इस पर भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र से उस देह के टुकड़े किये। उन टुकड़ों में माता सती के नेत्र की पुतली जिसे तारा कहा जाता है बीरभूम की इस भूमि पर आ गिरी। आज यही मंदिर तारापीठ धाम के नाम से विख्यात है। बीरभूमि का पूरा अर्थ है वन से घिरी हुई भूमि है।


शिव को स्तनपान कराती माँ तारा



तारापीठ मंदिर(ऊपर से लिया गया)

तारापीठ मंदिर इमारत


दूसरी कथा अनुसार जब भगवान भोलेशंकर नीलकंठ हो गए तो उनके गले मे जलती ज्वाला को  द्वितीय महाविद्या माँ तारा ने शांत किया। जिसके लिए प्रभू ने बाल रूप धर लिया। फिर माँ ने उन्हें स्तनपान करवा कर शीतलता प्रदान की। तीसरी कथा वशिष्ठ ऋषि से जुड़ी है। इसी स्थल पर वशिष्ठ ऋषि को माँ तारा ने दर्शन दे कर सिद्धियां वरदान स्वरूप दी थी।


उत्तर भारत की सभी नदियों में यहाँ बहने वाली द्वारका नदी एक मात्र नदी है जो दक्षिण से उत्तर दिशा में बहती है। 



अघोरी बामाखेपा:


अघोरी बामाखेपा बंगाल के बीरभूम जिले के आटला गाँव मे जन्मे एक अघोरी थे जिन्हें कई सारे चमत्कारों के लिए जाना जाता है। बामाखेपा माँ तारा के परम भक्त थे। एक गरीब ब्राह्मण परिवार में जन्मे बामा को बचपन से ही ईश्वर के बारे में चिंतन करते रहने में बीतता था। फिर जब उन्हें तारापीठ का बुलावा आया तो उन्होंने यहां रहकर घोर साधना की। माँ तारा प्रसन्न होकर उन्हें अपने दुर्लभ दर्शन दे सिद्धियों से प्राप्त की। बामाखेपा बंगाल के ही संत रामकृष्ण परमहंस के समय के थे। जगजाहिर है, कैसे माँ काली परमहंस को स्वयं भोजन खिलाने आती थी और बामाखेपा को भी माँ तारा का स्नेह प्राप्त था। 



अघोरी बामाखेपा

अघोरी बामाखेपा के रहस्य


तारापीठ मंदिर:


रामपुरहाट उपप्रभाग में तारापीठ नगर का प्राचीन नाम चंडीपुर ग्राम था। माता तारा का मंदिर एक शक्तिपीठ और सिद्धिपीठ दोनों होने के कारण इसकी प्रसिद्धि बढ़ती गयी और चंडीपुर(माँ दुर्गा का प्रचलित उग्र रूप) ग्राम तारा पीठ बन गया। 


माँ तारा मूर्ति



तारापीठ नगर की परिसीमा में यह मंदिर मध्यम आकार का है। मंदिर लाल इटों से बना है। इसकी नींव भी मोटी और ठोस है। मंदिर भवन एक गलियारे द्वारा जुड़ा हुआ है जो मंदिर शिखर से जा मिलता है। माँ तारा की मूर्ति गर्भ गृह में छज्जे के नीचे सटीक विराजमान है। अपने दो चरित्र के दर्शन माँ दो मूर्तियों में देती है। एक तीन फीट ऊंची मूर्ति उग्र भाव में ज़िव्हा बाहर, मुंड माला धारण किये भगवान शिव के ऊपर खड़ी हुई। दूसरी सौम्य मातृत्व रूप लिए हुए विषपान किये त्रिपुरारी को स्तन से दूध पिलाति हुई। माँ पर चढ़ा हुए लाल कुमकुम के तिलक का पंडित जी मंदिर आनेवाले श्रद्धालुओं पर लगाते हैं। पंडित गेंदा, गुड़हल और गुलाब इत्यादि फूलों से सजी हुई माँ की प्रतिमाओं से दृष्टि नहीं हटती। देवी तारा को न केवल मिष्ठान, फल और नारियल का भोग अर्पित किया जाता है अपितु साथ ही मदिरा का भोग भी चढ़ाया जाता है। 


तारा माँ, मुण्डमालिनी मंदिर

माँ तारा के साथ महादेव मंदिर और माँ तारा का मुण्डमालिनी मंदिर भी स्थापित है।


तारापीठ मंदिर रहस्य:


मंदिर में बकरों की बलि भी दी जाती है। माँ तारा बगैर बलि के प्रसन्न नहीं होती। बकरों की बलि देनेवाला पहले स्वयं स्नान कर बकरों को अच्छी तरफ स्नान कर कर स्वच्छ करके एक तीखी तलवार से माँ तारा का नाम उच्चारण कर काट देते हैं। इसमें से एक कटोरा रक्त मा को मंदिर में माँ के विग्रह समक्ष अर्पित किया जाता है। 


प्रभू श्री रामचंद्र ने यहां राजा दशरथ का पिंड दान किया था। इसी के चलते मंदिर में मान्यता अनुसार पितरों का पिंड दान भी होता है।


श्मशान भूमी:


माँ तारा दूसरी महाविद्या है। उग्र महाविद्याओं में होने के कारण माँ श्मशान में निवास करती है। बीरभूमि में तारापीठ मंदिर एक श्मशान भूमि के मध्य स्तिथ है। श्मशान भी शक्तिपीठ का हिस्सा है। प्रतिदिन तारा माँ की पूजा अनुष्ठान बिना किसी चिता के हविष्य से आरम्भ नहीं होती। तारापीठ श्मशान में अघोरी साधु तपस्या में देखने को मिलते हैं। कई अघोरी साधुओं के परिवार यहां पीढ़ियों से विचरण कर रहे हैं। अत्यंत पुराने घने पीपल, बरगद आदि के वृक्षों के बीच अघोरी साधुओं की कुटिया झोपड़ी जिनपे मानव और जंगली और पालतू जानवरों की खोपड़ी रखी हुई दिखती हैं। इन खोपडियों में प्राणोत्सर्ग किये हुए लोगो की और कुंवारी कन्याओं के अवशेष मिलते हैं जिन्हें तंत्र क्रियाओं में अधिक प्रयोग में लाया जाता है। आसपास में सांप, बिच्छू रेंगते हुए और गीदड़, कुत्ते और दूसरे पशु रोते-चिल्लाते हुए दिखेंगे। देवी की तंत्र साधना में लीन ये साधू कोई सिद्धि पाने या सांसारिक माया से सम्पूर्ण छुटकारा पाने के उद्देश्यों में लगे हुए होते हैं। 


        
तारापीठ श्मशान भूमि


यहां दो श्मशान है जिसमे से एक तांत्रिक श्मशान और दूसरा सर्वजन श्मशान है। तांत्रिक श्मशान में तांत्रिक क्रिया यहाँ बसे अघोरी और तांत्रिक साधु उपयोग में लाते हैं। वहीं सर्वजन श्मशान आम जनता के उपयोग में है। 


मित्र हिमांशु श्रीवास्तव द्वारा बनाई



जीवित कुंड: 


रोग दोष निवारण हेतु मंदिर में अंदर प्रवेश करने पर जीवित कुंड स्थित है। माँ के मंदिर के बाहर इस कुंड में स्नान करने पर बीमारियों का समाधान होता हैं।


प्रसाद और भोग


मंदिर में भक्तों के लिए शुल्क और ननिशुल्क प्रसाद की भी व्यवस्था मंदिर ट्रस्ट द्वारा की गई है। इस भोग में माँ को मछली प्रसाद रूप में जो चढ़ाई जाता है उसी के साथ स्वादिष्ठ दाल-भात, रसगुल्ला और सब्जी- पूरी के साथ परोसा जाता है।


श्मशान तारा


मंदिर दर्शन:


माँ तारा के दर्शन के लिए वी.ऑय.पी. और साधारण दर्शन दोनों उपलब्ध हैं। वी.आई.पी दर्शन दो तरह के हैं और शुल्क भी। इसका मंदिर ट्रस्ट के दफ्तर में पता लगाया जा सकता है। 

साधारण दर्शन करने के लिए एक लंबी लाइन लगानी पड़ती है। देवी माँ के बेहतर दर्शन के लिए रात 7 से 10 बजे के बीच का समय उत्तम होता है। 


जो भक्त मंदिर में कार्य सफल करवाने के लिए यज्ञ हवन करवाना चाहते है उसका प्रबंध भी मंदिर के पुजारियों द्वारा किया जाता है। 


तारापीठ मंदिर कैसे पहुँचे:


 तारापीठ शक्तिपीठ मंदिर, बीरभूम जिले से कोलकाता के हावड़ा रेलवे स्टेशन तक कि दूरी 290 किमी है तथा यह दूरी NH12 और NH19 से 6 घण्टो में सड़क या रेल सर पूरी की जा सकती है। 


कोलकाता हवाई अड्डे से मंदिर की दूरी 260 किमी दूर है और 6 घण्टो में पूरी की जा सकती है। कोलकाता के डम डम हवाई अड्डे से भारत के हर कोने से हवाई सेवा शुरू रहती है।

 
तारापीठ मार्ग की द्वार


✒️स्वप्निल. अ


(नोट:- ब्लॉग में अधिकतर तस्वीरें गूगल से निकाली गई हैं।)


 . 

गुरुवार, 7 दिसंबर 2023

मुंडेश्वरी मंदिर,कैमूर,बिहार

पौराणिक इतिहास:

बिहार के मुंडेश्वरी देवी मंदिर का इतिहास सतयुग के समय का है और यहां सबसे पहले महादेव का शिवलिंग था और इसके पश्चात माता पार्वती का मुंडेश्वरी रूप में विराजमान हुई। मुंडेश्वरी मंदिर स्थान का सबसे पहले विवरण स्कंद पुराण में मिलता है। इसके अलावा मार्कण्डेय पुराण अनुसार यही वह स्थल है जहां माँ दुर्गा ने काली रूप धर, चंड-मुंड नामक राक्षस का वध किया था। राक्षस मुंड का सिर कैमूर को इस पहाड़ी पर गिरने की वजह से यह मंदिर मुंडेश्वरी मंदिर कहलाया।




प्राचीन इतिहास: 


मंदिर का सबसे पहला शिलालेख साल 389 ईसवी का बताया जाता है। इस बात का दावा यहां मिले शिलालेख में मिलता है। उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध से बीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध के बीच कई अंग्रेज़ अधिकारियों ने इस क्षेत्र का दौरा कर मंदिर की जानकारी जुटाई। मुंडेश्वरी माता का यह स्वर्ग से धाम भी देश के लाखों मंदिरों की  ही तरह मुग़लों और दिल्ली सलतनत के हमलों से बच ना पाया। देवी मुंडेश्वरी वराही रूप में है। वराही को काशी की रक्षिका देवी भी माना जाता है। 



         

कुल मिलाकर पौराणिक और प्राचीन इतिहास को मिलाकर देखें तो यह देवी मंदिरों में और भगवान शिव, विष्णु आदि देवों से भी अधिक पुराना है। 

मुंडेश्वरी मंदिर:


पँवरा पहाड़ी पर बसे मुंडेश्वरी मंदिर 608 फ़ीट की ऊंचाई पर स्तिथ है। मंदिर काले पत्थर से बना अष्टकोणीय आकर में है और दोनों बगल में बहुत सारे टूटे हुए अवशेष बिखरे पड़े है। मंदिर के पश्चिम में विशाल नंदी कि मूर्ति है और पूर्व मुख् किये हुए आज भी उसी तरह तटस्थ बैठे है। माता की मूर्ति में इतनी शक्ति होने के कारण मूर्ति को ज़्यादा समय ना देखने की हिदायत यहां के पुजारी आनेवाले भक्तों को दे देते हैं। माँ मुंडेश्वरी मंदिर में वराही रूप में विराजी है।



माता मुंडेश्वरी मूर्ति


देश के अनेकों मंदिर मुग़ल और इस्लामी शासन काल में  तहस-नहस कर दिए गए थे उनमें से एक माँ मुंडेश्वरी का यह मंदिर भी है। मात्र इतना फर्क है कि जहाँ अनेकों मंदिरों पर दरगाह और मस्जिदें बना दी गयी वहीं मुंडेश्वरी धाम मेन मंदिर ईश्वर की विशेष कृपा से बचा रहा। काफी सदियों तक आम जनता की दृष्टि से दूर रहने के कारण मंदिर 



ऐसी बलि और कहीं नहीं:


मंदिर में किसी भक्त की मनोकामना पूरी होने के पूर्व बलि देने का संकल्प लेके मनोकामना पूरी होने पर बकरे की बलि माता को समर्पित करते हैं। मुंडेश्वरी मंदिर में दी जाने वाली पशु बली में पशु के शरीर से रक्त की एक बूंद भी नहीं निकलती क्योंकि पशु को केवल माता की मूर्ति के नीचे रख कर कुछ चावल चढ़ा कर मंत्र बोले जाते हैं। कुछ ही क्षण में बकरा बेशुद्ध हो कर वापिस होश में आ जाता है मानो जैसे परलोक से लौटकर आया हो। 



यह केवल धार्मिक ही नहीं बल्कि उससे कहीं ज़्यादा एक आध्यात्मिक रीति है जो 1700 वर्ष से मंदिर में निर्बाधित चली आ रही है। 


 पँवरा पहाड़ी के नीचे बने संग्रहालय में पुरातत्व विभाग द्वारा संरक्षित मंदिर के अनेक अवशेष जैसे खंडित मूर्तियाँ, स्तम्भ इत्यादि संग्रहित है। इन मूर्तियों में भगवान, गणेश, कालभैरव, विष्णु, सरस्वती और महालक्ष्मी है। 



पंचमुखी शिवलिंग:


मंदिर महादेव का पंचमुखी शिवलिंग विराजमान है जो दिन के तीन पहर में तीन बार रूप बदलता है। जिस पत्थर से यह पंचमुखी शिवलिंग निर्मित किया गया है उसमे सूर्य की स्थिति के साथ साथ पत्थर का रंग भी बदलता रहता है।


  बलि की यह सात्विक परंपरा पुरे भारतवर्ष में अन्यत्र कहीं नहीं है I एक तरफ मंदिर तक पहुँचने के लिए  524 फीट तक सड़क मार्ग की सुविधा है जहाँ हल्की गाड़ियाँ जा सकती है I राजधानी पटना से प्रतिदिन कई वातानुकूलित एवं सामान्य गाड़ियाँ भभुआ के लिए प्रस्थान करती है। वाराणसी तथा पटना से रेल द्वारा  आने के लिए गया -मुगलसराय रेलखंड पर  स्थित भभुआ रोड (मोहनियाँ) स्टेशन उतरना होता है


पंचमुखी शिवलिंग




मुंडेश्वरी माता मंदिर सुबह 6 से 7 बजे तक दर्शन के लिये खुला रहता है।



बौद्ध मंदिर?

हाल ही के दशकों में मुंडेश्वरी मंदिर को एक बौद्ध मंदिर साबित करने की काफी कोशिशें नव-बौद्धों द्वारा मार्क्सवादी और वामपंथी विचारधारा और षड्यंत्र के चलते करने की कोशिश की गई है। अनर्गल तथ्य बिना किसी ईतिहासिक प्रमाण के चलते यह दिव्य रचना नव बौद्धों के हाथों में जाने से बची है। 


यहाँ मिली लगभग हर मूर्ति को भगवान का रूप बताने का प्रयास किया गया है। किंतु यह प्रामाणित नहीं हो पाया क्योंकि मंदिर पक्ष के पास इसके कुछ लिखित साक्ष्य संरक्षित मिले हैं। जैसे बौद्ध मंदिरों में जो शिलालेख मिलते है वह केवल पाली लिपी में होते हैं जबकि प्राचीन मंदिरों में ब्राह्मी लिपी, संस्कृत या तमिल भाषा का उपयोग होता है। 


यहां देवियों की मूर्ति जिनपे स्त्री संकेत स्पष्ट दिखाई देते हैं, नव बौद्ध इसे भी भगवान बुद्ध की कहकर मूर्खता करते है।



मुंडेश्वरी मंदिर कैसे पहुँचे:


कैमूर से निकटतम शहर वाराणसी और पटना है। वाराणसी से कैमूर 101 किमी है और साढ़े 3 घण्टे में पहुँचा जा सकता है। पटना से कैमूर की दूरी 223 किमी है। यह दूरी 6 घण्टे में पूरी की जा सकती है। 

पटना और वाराणसी रेलवे स्टेशन देश के बाकी शहरों अच्छी तरह जुड़ा हुआ है। 

वाराणसी का लालबहादुर शास्त्री हवाई अड्डा और पटना हवाई अड्डा से देश के अन्य राज्यों के लिए विमान सर्व उपलब्ध रहती है।


✒️स्वप्निल. अ


(नोट:- ब्लॉग में अधिकतर तस्वीरें गूगल से निकाली गई हैं।)



रविवार, 3 दिसंबर 2023

ओ. पी बाबा मंदिर, सियाचीन

बाबा हरभजन सिंह के नाम की कहानी और  गुरुद्वारे के बारे में सब परिचित थे पर देवतुल्य हो चुके ओ. पी. बाबा के बारे बहुत कम हिन्दू परिचित थे।


ओ.पी. बाबा

भारत वर्ष और सनातन धर्म इतिहास मैं सदैव से ऐसे पुरुषार्थी वीर हुए हैं जो दुश्मनो से लड़कर वीरगती को प्राप्त हो संत और ईश्वर जैसा स्थान प्राप्त किया हो। इसका उदाहरण छत्रपती शिवाजी महाराज, वीर शिरोमणी महाराणा प्रताप, गुरु गोबिंद सिंह, वीरांगना रानी लक्ष्मी बाई हैं। 


पूज्य मातृभूमि की स्वतंत्रता के बाद कुछ वीर ऐसे भी हुए जिन्हें उतनी ख्याती और सत्कार नहीं मिल पाया या इतिहास के पन्नों में खो गये। भारतीय थल सेना में ऐसे वीर हुए हैं जिन्होंने हिमालय की चोटियों पर विषम परिस्थितियों में अपने प्राण गंवा दिए। 





एक ऐसे ही वीर थे जिनका नाम था ओम प्रकाश सिंह। इन्हें अब बाबा ओम प्रकाश कहा जाता है। इनका एक मंदिर सियाचीन में लगभग 20000 फ़ीट की ऊंचाई पर है। भारतीय सेना की 62 टुकड़ियाँ तैनात है और तकरीबन 10000 से ज्यादा सैनिक यहां पहरा देते है। यहां सेना के जवान हर पल दुश्मन पर कड़ी नजर रखे हुए खड़े रहते हैं। किंतु दुश्मन से कहीं अधिक, यहां मौसम से सैनिकों की जान जाती है। सन् 1980 के शुरुआती सालों में ओ.पी. सिंह नाम के एक सैनिक सियाचीन के इस बर्फीले रेगिस्तान में पहरा दे रहे थे फिर उसके बाद वे लापता हो गए।  उनकी मौत की कभी कोई आधिकारिक पुष्टि आज तक नहीं हो पाई और नाहीं मृत देह की प्राप्त हुई।



मंदिर गेट


किंतु कुछ वक्त बाद यहां तैनात बाकी सिपाहियों को वे सपने में दिखाई देने लगे। सपनों के जरिये वे आनेवाले बर्फीले तूफान का हाल और मौसम का मिजाज पहले ही बता देते। और तो और अगर भूल चूक से कोई सैनिक रास्ता भूल जाये तो उसे सही रास्ता भी बता देते। सेना के उच्च अधिकारियों को पहले यह यकीन नहीं हुआ किंतु जब एक बाद ऐसी घटनाएं होने लगी तो एक अलौकिक शक्ति का विश्वास उन्हें भी होने लगा। 


मंदिर आरती




1996 में ओम् प्रकाश बाबा का मंदिर एक कुटिया में बना दिया गया और 2003 आते-आते पक्के मंदिर स्वरूप भी पूर्ण हुआ।। 


बाबा की मूर्ति



बाबा के प्रति आभार का आलम ऐसा है कि सियाचीन में पोस्ट होने वाला जवान जब यहां आता है और जाता है, दोनों ही बार बाबा का आशिर्वाद लिए बगैर आगे नहीं बढ़ता है। भारतीय सेना सियाचीन में सीमा पर हो रही किसी भी निर्णय के पहले बाबा को रक औपचारिक रिपोर्ट भेजती है वैसे ही जैसे सेना के किसी जीवित अधिकारी को करती हो। 


इस मंदिर में हिन्दू धर्म के देवी देवताओं भी ओ. पी. बाबा के साथ विराजे हैं। किंतु भारतीय सेना और राष्ट्र के सेकुलरवाद को देखते हुए इस्लाम, ईसाई, सिख और बौद्ध, जैन धर्मों के भी चिन्ह आदर के साथ रखे गए हैं। 


बाबा द्वारा पहनी वरदी


ओ.पी. की यहां दोनो वक़्त आरती और पूजा की जाती है। मंदिर भारतीय सेना के नियंत्रण में होने और अंतरराष्ट्रीय सीमा पर होने की वजह से इसे आम जनता के लिए नहीं खोला गया है। 



।। जय हिंद ।। 

🙏🇮🇳🚩🙏


✒️ स्वप्निल. अ

 


(नोट:- ब्लॉग में अधिकतर तस्वीरें गूगल से निकाली गई हैं।)







 

गुरुवार, 23 नवंबर 2023

बूढ़ानीलकंठ मंदिर, काठमांडू, नेपाल

पौराणिक मान्यता:

किंवदंती अनुसार जब सत्युग में समुद्र मंथन हुआ तब सारे ब्रम्हांड में समुद्र मंथन से निकला विष जीव-जंतुओं का विनाश करने लगा। तब महादेव ने आपने कंठ में सारे विष को निगल लिया। इसके के पश्चात, कंठ में जलन हुई तो महादेव नेपाल के इस स्थान की ओर आ कर त्रिशूल से प्रहार किया और जल धारा प्रकट की। यह जल धारा से एक कुंड का निर्माण हुआ जिसे आज गोसाईं कुंड के नाम से जाना जाता हैं।


निद्रा में भगवान विष्णु

इतिहास:


भगवान विष्णु की यह प्रतिमा कथा अनुसार एक किसान को खेत मे काम करते वक़्त मिली थी और दूसरी किंवदंती के अनुसार इसे 7वी शताब्दी में कहीं बनवाया गया था और राजा विष्णुगुप्त ने इस प्रतिमा को स्थापित करवाया था। श्री हरि की मूर्ति के नीचे भगवान महादेव अप्रत्यक्ष रूप से विराजित है जो साल में एक बार दर्शन देते हैं।




मंदिर मूर्ति:


मूर्ति की लंबाई 5 मीटर और सरोवर की 13 मीटर है। इस झील का नाम गोसाई कुंड कहते हैं। मूर्ति को एक विशाल काले बेसाल्ट पत्थर पर कलात्मक सुंदरता के साथ उकेरा गया है। गोसाई कुंड समुद्र तल से 436 मीटर ऊंचाई पर स्थित है।  इस सरोवर में भगवान नारायण शेषनाग की कुंडली मे सोई मुद्रा में है। यह सरोवर ब्रह्मांडीय समुद्र का प्रतिनिधित्व भी करता है। भगवान विष्णु के 4 चिन्ह: शंख, गदा, कमल और चक्र चार दिव्य गुणों को दर्शाते हैं। शंख 4 तत्व को, चक्र मन को, कमल का फूल चलते ब्रह्मांड को और गदा ज्ञान का प्रतिनिधित्व करते हैं। भगवान का शरीर चांदी के बाजूबंद से सजाया हुआ है। 


मंदिर में सुंदर नक्काशियों की भरमार है। नेपाल के अन्य मंदिरों की तरह बूढानीलकंठ मंदिर में भी भगवान श्री हरि के वाहन गरुड़ देव जी, मंदिर के द्वारपाल बनके विराजे हैं। भगवान विष्णु की मूर्ति के पैर शेषनाग की कुंडली के पार है। 




यह रहस्यम मंदिर नेपाली राज परिवार के लिए श्रापित माना गया है। कहते हैं की राज परिवार का कोई भी सदस्य अगर यहां भगवान के दर्शन कर ले या चूक से भी आ जाये तोह उसकी मृत्यु हो जाएगी। 


विष्णु या बुद्ध:


 नेपाल के इस प्राचीन मंदिर में न केवल हिंदू किंतु नेपाल के बौद्ध भी बड़ी गहरी आस्था रखते है। नेपाली बौद्ध भगवान विष्णु की इस मूर्ति को बुद्ध की मूर्ति मान पूजते है तथा इस मंदिर को एक बौद्ध मंदिर। बौद्ध धर्म सनातन के अंतर्गत होने की वजह से नेपाली हिंदू और बौद्धों में आजतक इस पर कभी-कोई विवाद या वैमनस्य पैदा नहीं हुआ है। 






त्यौहार एवं महोत्सव:


नेपाल के विशेष विष्णु तीर्थों में से एक होने की वजह से नेपाल, भारत और बाकी देशों से अनेक आगंतुक और श्रद्धालू, बूढानीलकंठ मंदिर हर वर्ष देव शयनी और प्रबोधिनी एकादशी पर भारी संख्या में आते हैं।  इस महीने में भगवान विष्णु अपने 4 महीने की निद्रा से जागते है और इसीलिए इस समय बड़े मेले का आयोजन मंदिर में करवाया जाता है।


लोगों का मानना है कि जुलाई से अगस्त में होनेवाले श्रावण उत्सव के दौरान भगवान शिव का चेहरा दिखाई देता है। 


मंदिर समय सारिणी:


मंदिर सवेरे 5 बजे से संध्या 7 बजे तक आगंतुकों के लिए खुला रहता है।

 

✒️स्वप्निल. अ


बुधवार, 22 नवंबर 2023

लक्ष्मी नरसिंह स्वामी मंदिर, वारंगल, तेलंगाना

स्थानीय किंवदंती:

मल्लुर, वारंगल का यह क्षेत्र अपनी लाल मिर्च की पैदावार के लिए बहुत प्रसिद्ध है। इस क्षेत्र से जुड़ी हुई प्रचलित किंवदंती है। एक गरीब किसान था जिसके पास धन बिल्कुल नहीं था सिवाय मिर्च के एक पौधे के। किसान ने उस पौधे से कुछ मिर्च उगाई और भगवान नरसिंह स्वामी की इस मूर्ति को अर्पित कर दी। तब से इस क्षेत्र की मिर्च उत्कृष्ट किस्म की और सबसे अधिक उगाई जाती है। 




भगवान नरसिंह देव


इतिहास:


नरसिंह स्वामी मंदिर का पहला प्रमाण देखा हुआ प्रमाण 6वी सदी का है जबकि मंदिर तकरीबन 5000 वर्ष पुराना है। अगस्त्य ऋषि ने इस पर्वत को हेमाचल् नाम दिया था। इसी स्थान पर भगवान राम ने खर और दूषण समेत 14000 राक्षसों का वध भी किया था। तथा यह क्षेत्र दशानन रावण ने अपनी बहन शूर्पणखा को उपहार स्वरूप भेंट दिया था।


 नरसिंह देव की मूर्ति के प्राकट्य की कथा कुछ रहस्यों से घिरी हुई है। हेमाचल की पहाड़ियों में भगवान की मूर्ति एक तेज प्रकाश के फैलने के बाद खोजी गयी थी। यह मंदिर मल्लुर के सागर गांव में स्थित और यहां के निवासी बताते हैं कि यहां पहले अनायस कभी भी आग लग जाया करती थी। फिर पंडितों ने बताया कि भगवान नरसिंह उग्र रूप लिए हुए और उनके तेज के कारण आग लग जाती थी। इसका निवारण भगवन को यःज्ञ- अनुष्ठान से प्रसन्न कर शांत किया गया और आग लगने की घटना पर विराम लगा।




लक्ष्मी नरसिंह स्वामी मंदिर


लक्ष्मी नृसिंह स्वामी मंदिर समुद्र से 1500 फ़ीट ऊपर हेमाचल की पहाड़ी पर घने पुत्तकोंडा जंगलों के बीच स्थित है। प्रभु दर्शन करने के लिए 150 सीढियां चढ़नी पड़ती है। नरसिंह मंदिर के रास्ते मे बजरँगबली को समर्पित मंदिर भी आता है। इस मंदिर ने बजरंगी शिखानजने के रूप में विराजे है। शिखानजने इस मल्लुर क्षेत्र के क्षेत्रपाल(राजा) कहलाये जाते हैं।




 

विष्णु अवतार नरसिंह की मूर्ति ज्वालामुखी पर्वत में स्वयम्भू प्रकट हुई थी। नरसिंह स्वामी कक विग्रह 9.2 फ़ीट का है। इस हैरत के देने वाली मूर्ति के अलावा संसार में ऐसी कोई देव प्रतिमा नहीं जो किसी मानव शरीर जैसी नरम हो। यहां के पुजारी बताते है कि इस मूर्ति में अगर कोई अपनी उंगली दबाता है तो उस गड्ढे के निशान उंगली उठाने पर साफ दिखाई देते है। मूर्ति के शरीर पर मानव जैसे बाल भी देखे जाते हैं। पूरे पर्वत की जांच-पड़ताल करने पर भी एक भी दूसरा कोई ऐसा पत्थर ना मिला जी भगवान की मूर्ति जितना मुलायम हो। यह ताज्जुब कर देने वाली बात आज भी शोधकर्ताओं के लिए बड़ा विषय बना हुआ है। 


भगवान की नाभी से पवित्र जल निकलता है। पुजारी नाभि की हल्दी का लेप से लगाये रहते हैं। भक्त इसे पवित्र तीर्थम मान अपने साथ ले जाते हैं। इसमें अनेक बीमारियाँ और पाप ठीक करने की चमत्कारिक शक्ति मानी जाती है। जब रानी रुद्रमादेवी एक भयानक रोग से ठीक नहीं हो पा रही थी तब एक वैद्य के सुझाव पे भगवान नरसिंह के दिव्य तीर्थम जल का सेवन कर ठीक हो गयी। इस जल को कोनेरू कहा जाता है। इसकी सुगंध चंदन जैसी होती है सो इसे "चंदना ध्वरम" कहा जाता है। विदेश से आनेवाले भक्त भी इसे अपने साथ बोतल में बंद कर ले जाते हैं। इस जल की धारा का अंत कहाँ होता है इसका आज तक ज्ञान किसी को ना हुआ।






मंदिर शाम 5 बजे के बाद बंद कर दिया जाता है क्योंकि भगवान नरसिंह स्वयं इस क्षेत्र में सिंह रूप में घूमते है। सिंह की दहाड़ यहां मंदिर अगल-बगल वन क्षेत्र में सुनी जाने का दावा किया गया है। 


राज्य सरकार ने इस विस्मय कर देनेवाले धाम को अभी तक ज़्यादातर बाहर की जनता को अनभिज्ञ कर रखा है। मंदिर आज भी तेलंगाना राज्य सरकार के कब्जे में है। मंदिर को जड़ी-बूटियों की जैव विविधता क्षेत्र की श्रेणी में रखा गया है। 


हर 12 वर्ष होनेवाले गोदावरी पुष्कर मेले का आयोजन किया जाता हैं। सन् 2003 के मेले में मंदिर का पुनरूत्थान किया गया था। 


 त्यौहार और उत्सव:


मंदिर में वैकुंठ एकादशी, श्री ब्रह्मोत्सवम और नरसिंह जयंती विशेषतः मनाई जाती है। लाखों की संख्या में इन तिथियों पर भक्त मंदिर नरसिंह भगवान की झलक पाने पहुँचते हैं। 

 

मंदिर गर्भ-गृह


मंदिर दर्शन समय सारिणी:


रविवार से शनिवार सुबह 8 से ही बजे तक शाम 3 से 5 बजे तक।

  

पूजा और सेवा का समय:


सुप्रभातम -  सुबह 4 से 4:30 बजे तक

बिंदर तीर्थम - सुबह 4:30 कम से 5 बजे तक 

बाल भोगम - सुबह 5 से 5:30 बजे तक 

निजभिषेकम- सुबह 5:30 से 6:30 बजे तक

अर्चन- सुबह 6:30 से 7:15 बजे तक

दर्शन- सुबह 7:15 से 11:30 बजे तक


मल्लुर अन्य मंदिर:


मल्लुर में लक्ष्मी नरसिंह मंदिर के अलावा मलाग्नि मल्लिकार्जुन स्वामी मंदिर, समक्का सरलम्मा मंदिर और श्री रामलिंगेस्वर मंदिर भी दर्शनीय है।


लक्ष्मी नरसिंह मंदिर कैसे पहुँचे:


मंदिर से सबसे निकट हवाई अड्डा हैदराबद का शमशाबाद हवाई अड्डा है। 


सबसे निकटतम रेलवे स्टेशन मानुगुरु रेलवे स्टेशन है।


सड़क मार्ग से एडुलपुरम रोड पर वारंगल के लिए बहुत सारी बसे और प्राइवेट गाड़ियां उपलब्ध रहती है ।






✒️स्वप्निल. अ

(नोट:- ब्लॉग में अधिकतर तस्वीरें गूगल से निकाली गई हैं।)


शनिवार, 18 नवंबर 2023

ककनमठ मंदिर का रहस्य, मोरेना, मध्यप्रदेश

मध्यप्रदेश के मोरेना जिले में लह-लहाते बाजरे के खेतों के बीच बसा है मध्य भारत के चुनिंदा रहस्यमय मंदिरों में शायद सबसे अनूठा मंदिर। यह है ककनमठ मंदिर जो अपने अंदर कई अनसुलझी गुत्थियां बांधे बैठा है। 


बुधवार, 1 नवंबर 2023

निकुंभला देवी मंदिर, बैतूल, मध्यप्रदेश


माता निकुंभला कौन है?


सबसे पहले यह ध्यान में रहना ज़रूरी है कि माता निकुंभला शक्ति रूपों में कोई अलग रूप नहीं हैं और ना ही शाक्त परंपरा के बाहर माने जाने वाले रूपों में से एक है। देवी का हर अवतार शाक्त परंपरा के अंतर्गत ही देवी मार्कण्डेय पुराण और दुर्गासप्तसती में बताए गए रूपों में सूचित हैं।  माँ निकुंभला माता पार्वती के योग निद्रा रूप से निकला हुआ तीव्र अघोर रूप है। यह देवी रूप की पूजा केवल अघोरी या तंत्र के उच्चतम साधक ही करते है। सबसे उग्र और सबसे भयंकर स्वरूपों में माँ के इस रूप को केवल तंत्र और अघोर साधना से प्रसन्न किया जा सकता है।


सिंह रूपी माँ निकुंभला

माँ निकुंभला का प्रादुर्भाव:


शास्त्रों के अनुसार, माँ निकुंभला का अवतरण भगवान विष्णु के नरसिंह अवतार के पश्चात की घटना है। नरसिंह अवतार लेने और असुर हिरण्यकश्यप का अंत करने के बाद भी नारायण का क्रोध शांत नहीं हो रहा था तब भगवान शिव ने शरभ अवतार धारण किया था।। शरभ अवतार आधा सिंह और और आधा पक्षी का रूप था। लंबे समय तक दोनों देवों में युद्ध चलता गया किंतु परिणाम कुछ नहीं निकला। शिव और नारायण की शक्ति एक दूसरे के बराबर थी। ब्रह्मांड के अस्तित्व पर सवाल आ गया था। 


तब समस्त देवी-देवताओं ने माँ पार्वती से प्रार्थना की। माँ भक्तों की प्रार्थना पर अपने योग निद्रा रूप से निकुंभला रूप प्रकट किया है। योग निद्रा रूप से माता ने प्रचंड गर्जना कर दोनों देवों को स्तब्ध कर दिया और इससे दोनों शांत हो अपने दैवीय रूप में लौट आए।


माँ पार्वती का निकुंभला रूप भगवान विष्णु के नरसिंह और भगवान शिव के शरभ अवतार की संयुक्त शक्ति है। इसीलिए माता यह करने में सफल हो पाई। इस नृसिंहनी रूप में माँ अच्छे और बुरे के संतुलन का प्रतिनिधित्व करती हैं। 


माता निकुंभला को कई सुंदर नामों से पुकारा जाता है। यह नाम प्रत्यंगिरा, अपराजिता, सिद्दलक्ष्मी, पूर्ण चंडी और अर्ध वर्ण भद्रकाली है। 

तनोट राय माता मंदिर, जैसलमेर, राजस्थान

भारत-पाक सीमा पर तनोट राय माता मंदिर लगभग 1300 वर्षो से स्थापित है जिसकी आध्यात्मिक शक्ति का परिचय सन् 1965 और 1971 के युद्ध के समय शत्रु दे...