भारत-पाक सीमा पर तनोट राय माता मंदिर लगभग 1300 वर्षो से स्थापित है जिसकी आध्यात्मिक शक्ति का परिचय सन् 1965 और 1971 के युद्ध के समय शत्रु देश को हुआ था। तनोट राय माता मंदिर को कई अन्य नाम जैसे युद्ध वाली देवी, रुमाल वाली देवी और बॉर्डर वाली देवी कहकर भी पुकारा जाता है। तनोट माता के मंदिर का भारत पाक युद्ध के समय से भारतीय सेना की बी.एस.एफ. संभालती है।
प्राचीन इतिहास:
जैसलमेर में 9वी सदी में एक धर्मनिष्ठ व्यक्ति मामड़ जी चारण रहते थे। उन्हें और उनकी पत्नी मेहरजी चारण की कोई संतान नहीं थी। वे आंवड माता के भक्त थे। आवंड माता हिंगलाज माता का ही एक रूप है। आंवड माता की उन्होंने कुछ वर्ष तपस्या की। तपस्या से संतुष्ट होकर माता ने उन्हें और उनकी पत्नी महडू जी चारणी को 7 पुत्री और एक पुत्र होने का आशिर्वाद दिया। सात पुत्रियां आजीवन ब्रह्मचारी रही। फिर जैसलमेर मैं उन्हें देवी स्वरूप माना जाने लगा। ।
तनोट गढ़ की नींव तनोट के अंतिम भाटी राजा तनु राव जी ने सन् 847 में तनोट गढ़ की नींव रखी तथा सन् 888 में तनोट दुर्ग की नीव रखी।
तनोट राय माता मंदिर का आधुनिक निर्माण बी एस एफ द्वारा करवाया गया था। मंदिर जैसलमेरी पीले पत्थरो से बनवाया गया है। मंदिर का सारा रख रखाव और देखभाल बी एस एफ के द्वारा करवाया गया है।
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| हिंगलाज माता |
मंदिर के मुख्य द्वार के सामने विजय स्तम्भ और एक प्राचीन कुआं है। विजय स्तम्भ पर राष्ट्र ध्वज का ध्वजारोहण हर वर्ष 15 अगस्त और 26 जनवरी को किया जाता है।
भारत पाक युद्ध में भूमिका:
वर्ष 1965 में भारत पाकिस्तान युद्घ छिड़ा। इस युद्ध को लोंगेवाला (Battle of Longewala)के नाम से भी जाना जाता है। शत्रु देश ने तनोट राय माता मंदिर प्परिसर में कई बम गिराए किंतु तनोट माता के सिद्धपीठ की एक ईंट तक नहीं हिल पाई। तकरीबन 400 छोटे और बड़े आकार के बम परिसर में गिरे अवश्य किंतु इनमें विस्फोट नहीं हुआ। यह बम आज मंदिर में भक्तों के लिए शोभित है।
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| तनोट मंदिर मंडप |
तनोट माता को युद्धवाली देवी माना गया है। भारत को युद्ध में विजय दिलवाने वाली माता के दर्शन के लिए उस समय पाकिस्तान के एक मेजर जनरल शाहनवाज खान ने भारत सरकार से मंदिर आने की अनुमति मांगी। दो वर्ष के प्रयास के बाद भारत सरकार ने उन्हें तनोट माता मंदिर में आने के लिए अनुमति मिली।
शाहनवाज खान को उत्सुकता माँ के दर्शन के लिए खींच लाई या उसके मन में श्रद्धा भाव जागृत हुआ यह तो किसी को पता नहीं होगा सिवाय तनोट माता को किंतु एक बात जो स्पष्ट है वो है उसके द्वारा चढ़ाई गयी सोने चांदी की छत्र। यह छत्र मंदिर में देखी जा सकती है।
रुमाल वाली देवी:
मंदिर से बाहर हज़ारों रुमाल और लाल-पीली चुनरें बंधी हुई मिलेंगी। इन कपड़ो में कुछ पैसे भी बांध दिए जाते है। ऐसा भक्त अपनी मनोकामना पूर्ति के लिए करते हैं। इसी कारण तनोट माता रुमाल वाली देवी भी कहलाई गयी हैं। मनोकामना पूर्ण होने पर श्रद्धालू इन रूमालों को खोलने वापिस आते है।
"थार की वैष्णोदेवी" - तनोट राय माता मंदिर इस विशेष नाम से भी प्रसिद्ध है। मंदिर को यह नाम 1965 के युद्ध के समय के बाद बुलाया जाने लगा है।
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| तनोट विजय स्तम्भ |
तनोट राय माता मंदिर के मुख्य द्वार के 1965 के युद्ध की याद में बनाया गया है।
वर्ष में दो बार नवरात्रों में मेला आयोजित किया जाता है। स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस पर भी भारी संख्या में भक्त और यात्री तनोट माता मंदिर में दर्शन के लिए आते हैं।
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| संग्रहित बम |
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न(FAQs):
आरती समय:
सुबह और संध्या 7- 7 बजे आरती बी. एस. एफ. द्वारा की जाती है।
तनोट माता मंदिर कैसे पहुँचे?
तनोट माता मंदिर पहुँचने के लिये बस और टैक्सी से हर समय उपलब्ध रहती है।
जैसलमेर एयरपोर्ट देश के सारे एयरपोर्टो से भी अच्छे से जुड़ा हुआ है।
भारत के प्रमुख नगर मुंबई से तनोट माता मंदिर जैसलमेर की दूरी 1200 किमी है जिसे एक दिन पूरा करने में लग जाता है।
तथा देश की राजधानी दिल्ली से दूरी 900 किमी है।
⏹️ एक ऐसा मंदिर जिसने दो युधों में दुश्मन देश के ऊपर विजय दिलवाई
तनोट मंदिर किस साल के किस समय पहुंचे?
तनोट मंदिर आने के लिए साल के अक्टूबर से मार्च के बीच का समय उत्तम रहता है।
पार्किंग व्यवस्था: मंदिर परिसर में पार्किंग की भरपूर व्यवस्था है।
खानपान और पूजा की दुकानें: खानपान और पूजा सामग्री की भी अनेक दुकानें उपलब्ध है।
- स्वप्निल. अ
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| भारत-पाक सीमा |











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