भारत-पाक सीमा पर तनोट राय माता मंदिर लगभग 1300 वर्षो से स्थापित है जिसकी आध्यात्मिक शक्ति का परिचय सन् 1965 और 1971 के युद्ध के समय शत्रु देश को हुआ था। तनोट राय माता मंदिर को कई अन्य नाम जैसे युद्ध वाली देवी, रुमाल वाली देवी और बॉर्डर वाली देवी कहकर भी पुकारा जाता है। तनोट माता के मंदिर का भारत पाक युद्ध के समय से भारतीय सेना की बी.एस.एफ. संभालती है।
रहस्यमय हिंदू मंदिरों, तंत्र और रहस्यमय ज्ञान की रहस्यमय दुनिया का अन्वेषण करें। छिपी हुई परंपराओं, पवित्र स्थलों और प्राचीन आध्यात्मिक अंतर्दृष्टि को उजागर करें।
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सोमवार, 21 अप्रैल 2025
तनोट राय माता मंदिर, जैसलमेर, राजस्थान
मेरा नाम स्वप्निल ए है और मैं एक फ्री लांसर लेखक, कंटेंट राइटर और डिजिटल क्रिएटर हूं।
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शनिवार, 30 मार्च 2024
माँ त्रिपुर सुंदरी मंदिर, बांसवाड़ा, राजस्थान
माना जाता है कि बांसवाडा के माँ त्रिपुर सुंदरी मंदिर की स्थली पर सत्युग में माता सती की एक उंगली का भाग यहाँ गिरा जिसके उपरांत यहाँ माता का मंदिर बनवाया गया था। इसे शक्तिपीठ के रूप में भी माना गया है। मंदिर का इतिहास राजा कनिष्क के काल के भी पहले का बताया गया है। किंतु सबसे प्रथम साक्ष्यों के अनुसार मंदिर का निर्माण राजा कनिष्क के काल में हुआ था। उस काल में अरावली पहाड़ियों के निकट तीन पुरियां - सीतापुरी, विष्णुपुरी और शिवपुरी हुआ करती थी। । पांचाल समाज के पाता भाई को माँ त्रिपुर सुंदरी ने एक भिक्षुणी के रूप में दर्शन दिए थे। तद पश्चात् पांचालों ने माता के मंदिर का जीर्णोद्धार का कार्य शुरू करवाया था। सन् 1157 में जीर्णोद्धार का कार्य प्रारंभ हुआ। मालवा, मारवाड़ और गुजरात के राजवंशों ने 11-12 सदी से मंदिर में आराधना शुरू की और अपनी कुलदेवी मानना आरंभ किया।
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| माँ त्रिपुर सुंदरी |
माँ त्रिपुर सुंदरी मंदिर:
देवी राज राजेश्वरी माँ त्रिपुर सुंदरी का दिव्य सुंदर मंदिर नागर वास्तु कला एक अप्रतिम भवन है। मुख्य गर्भ गृह के दरवाजे चांदी के बने हैं। अंदर माता का विग्रह काले रंग का है। माता की मूर्ति जागृत रूप में है। सवेरे कन्या रूप में, दिन में स्त्री रूप और संध्या से रात्री तक माता प्रौढ़ रूप में दर्शन देती हैं। मूर्ति में अठारह भुजाएँ तथा माता के चरणों मे श्रीयंत्र विराजमान हैं। मूर्ति के नव ग्रह नौ दुर्गा रूप को दर्शाते हैं। मंदिर प्रवेश करने पर तीन गुंबद दिखाई देते हैं। गुंबद के बाहर बनी छत्री में नन्दी जी विराजमान है।
सौम्य रूपा माँ त्रिपुर सुंदरी दश महाविद्याओं में तीसरी महाविद्या हैं। माँ के इस रूप में माँ के तंत्र और नौ दुर्गा रूप विद्यमान हैं। इसीलिये इस मंदिर में माता महालक्ष्मी, महाकाली और महासरस्वती रूप में विराजी है।
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| परिसर स्तोत्र:गूगल |
मंदिर एक शक्तिपीठ के साथ एक सिद्धपीठ भी माना गया हैं। यहाँ अनन्य साधु संतो ने माता की साधना की हैं। नवरात्री और गुप्त नवरात्री पर भक्त विशेष पूजा-अनुष्ठान करने आते हैं। माता का राजराजेश्वरी रूप भौतिक या आध्यात्मिक, इच्छा और प्रगती पूरा करने वाला है।
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| नन्दी महाराज स्तोत्र:गूगल |
सुबह ब्रह्म महूर्त से माँ की वंदना शंकराचार्य पद्धति से प्रारंभ की जाती है। देवी सुरेश्वरि का नित्य श्री दुर्गासप्तशती पाठ, श्री ललित सहस्त्रनाम से आवह्न किया जाता है।
पुराने मंदिर को बनाने का कार्य 1930 में मंदिर के शिखर निर्माण के साथ आरंभ हुआ था। सन् 1977 से 1991 के बीच मंदिर का पुनः जीर्णोद्बर कराया गया है। इन वर्षों के बीच में 109 कुंडीय महायज्ञ का आयोजन 1981 में कराया गया।
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| मंदिर प्रवेश द्वार |
आधुनिक मंदिर:
पुराने मंदिर की इमारत में आधुनिक निर्माण कार्य कराये गये। सन् 2006 से कुछ अद्धभुत बदलाव और जोड़ किये गए। इनमें स्वर्ण कीर्ति स्तम्भ और बाहरी परिसर बनवाया गया। पहली शिला का 23 जून 2011 और अंतिम शिला 24 अप्रैल 2016 में हवन से पूजन कर उदघाटित किया गया। पांचाल समाज द्वारा मंदिर का संचालन किया जाता हैं। समाज के 1233 यजमानों ने 1889 स्तम्भों को पूजन कर मंदिर को समर्पित किया था।
यात्रियों के विश्राम और भोजन करने हेतु एक भोजनालय और धर्मशाला भी बनी है।
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| कीर्ति स्तम्भ स्तोत्र:गूगल |
माँ त्रिपुर सुंदरी मंदिर कैसे पहुँचे:
माँ त्रिपुर सुंदरी मंदिर राजस्थान के बांसवाड़ा जिले में है। इसकी सीमा मध्यप्रदेश के रतलाम जिले के नजदीक है। रतलाम से मंदिर की दूरी 65 किमी है।
✒️स्वप्निल.अ
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रविवार, 21 जनवरी 2024
जगत शिरोमणि मंदिर, आमेर, राजस्थान
जगत शिरोमणि मंदिर राजस्थान के आमेर के प्रमुख धार्मिक और ईतिहासिक विरासतों में से एक है जिसका इतिहास जयपुर की सीमा के बाहर सर्वजन के ज्ञान में नहीं है।
मध्यकालीन इतिहास:
आमेर के राजा सेनापति मानसिंह और उनकी पत्नी द्वारा जगत शिरोमणि मंदिर का निर्माण करवाया गया था। इन दोनों का एक पुत्र हुआ जिसका नाम था जगत सिंह। जगत सिंह 18 वर्ष की आयु में एक युद्ध के लिए निकल पड़े। युद्धभूमि मे जाते समय कुछ हमलावरों ने उनकी हत्या कर दी। अल्प आयु में अपने इकलौते पुत्र को खोने के वियोग में रानी कनकवती ने उसकी स्मृति में एक भव्य इमारत बनाने को सोची। वासुदेव श्रीकृष्ण की उपासक रानी ने भगवान श्री कृष्ण को समर्पित यह मंदिर बनवाया। सन् 1599 से 1608 के बीच मंदिर बनकर तैयार हुआ।
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| श्रीकृष्ण-मीराबाई |
जगत शिरोमणि मंदिर:
मंदिर का नामकरण रानी के पुत्र जगत और श्री कृष्ण के एक और नाम शिरोमणि से मिलाकर रखा गया है। आमेर के पुरातन मंदिरों में से एक जगत शिरोमणि मंदिर राजपुताना महामेरू वास्तुकला में बना है। इसमें मकराना से मंगवाए गए सफेद और मलाई रंग के संगमरमर का उपयोग किया गया है। मंदिर में एक बरोठा, मंडप, स्वर्ग मंडप और गर्भ गृह है। मंडप दो मंजिला जिसके दो भाग एक दूसरे को काट रहे है। आमेर की मुख्य सड़क से मंदिर का मुख्य द्वार सम्पर्क में है। तथा राज महल से मंदिर के पीछे बने द्वार तक भी एक दरवाजा जुड़ा है।
छत पर मंदिर के सामने भगवान विष्णु के वाहन गरुड़ देव बने हुए हैं। गर्ब ग्रह के द्वार पर विष्णु जी के दशावतारों और निवास, क्षीरसागर का दृश्य मंदिर को को दिव्यता प्रदान करता है। बाहर खड़े विष्णु जी के द्वारपाल जय-विजय शिल्पित हैं। भगवान श्री कृष्ण उरुश्रृंगों और कर्णश्रृंगों से क्रमबद्ध सुशोभित है। मंदिर बनाने में उस समय के मूल्य अनुसार 9 लाख रुपये का खर्च आया था। जगत शिरोमणि मंदिर के द्वार पर ऊंचा भव्य तोरण बना हुआ है जिसपे देवी देवता और दो हाती आगन्तुकों का स्वागत करती मुद्रा में देखे जाते हैं।
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| स्वर्ग मंडप |
"श्री कृष्ण के साथ अमूमन राधा रानी या रुक्मिणी/सत्यभामा बगल में दिखती हैं। किंतु इस मंदिर में उनकी परम भक्त मीराबाई साथ में विराजी हैं।"
मंदिर महत्व:
जगत शिरोमणि मंदिर के बारे में माना गया है कि गर्भ-गृह में श्री हरि का वही विग्रह प्रतिष्ठित है जिसकी मीराबाई 600 वर्ष पहले पूजा किया करती थी। आखरी समय मे मीराबाई द्वारका में इसी श्री कृष्ण के विग्रह के साथ देखी गयी थी। और मीराबाई की देह इसके पश्चात् नहीं मिली सो माना यही गया कि कृष्ण के प्रेम में वे देह सहित वैकुंठ प्रस्थान कर गयी या विग्रह में समा गई थी। मीराबाई के विग्रह होने के पीछे का कारण यह समझा गया की, क्योंकि राधा रानी या देवी रुक्मिणी का विग्रह श्री कृष्ण के बराबर रखी जाती है किंतु इस मंदिर में मीराबाई का विग्रह कृष्ण से सिमटे हुए ना हो के नीचे अलग रखी गयी है। किसी कृष्ण भक्त के साथ यह मूर्ति महाराणा प्रताप के राज्य में आ पहुंची। हल्दीघाटी के युद्ध मे मुग़ल सेना के हमलों में बचते बचाते इस मूर्ती को आमेर के सेनापति राजा मानसिंह को किसी के द्वारा प्राप्ति हुई और फिर उन्होंने मंदिर में प्राण प्रतिष्ठिता की।
जगत शिरोमणि मंदिर कहाँ है?
जगत शिरोमणि मंदिर जयपुर के आमेर में देवी सिंहपुरा में स्तिथ है। मंदिर की जयपुर रेलवे स्टेशन से दूरी 11 किमी और जयपुर अंतराष्ट्रीय हवाई अड्डे से 19 किमी है। पर्यटक स्थलों के लिये प्राइवेट कैब और टैक्सी की सेवा उपलब्ध रहती है। साथ ही सरकारी बसें भी आमेर के किलों तक सुविधा प्रदान करती हैं।
✒️स्वप्निल. अ
(नोट:- ब्लॉग में अधिकतर तस्वीरें गूगल से निकाली गई हैं।)
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सोमवार, 16 अक्टूबर 2023
ॐ मंदिर, पाली, राजस्थान
अंनत ब्रह्मांड और सनातन धर्म का प्रतिनिधित्व करते चिन्ह "ॐ" का सबसे विशाल और बड़ा भव्य मंदिर राजस्थान के पाली जिले के जाडन गांव में पिछले 24 वर्षों से बन रहा है। मंदिर निर्माण अपने अंतिम चरण में पहुँच चुका है और इस वर्ष दिसंबर के अंत मे उद्घाटन होने जा रहा है।
ॐ मंदिर:
उत्तर भारत की नागर वास्तुशैली में विश्व के सबसे पहले और सबसे बड़े 'ॐ' मंदिर का 250 एकड़ में निर्माण हुआ है। मंदिर की ऊंचाई 135 फ़ीट है और कुल 4 खण्डों में मंदिर विभाजित है। इसमें 1 खण्ड पूरा जमीन के नीचे है और तीन जमीन के ऊपर की तरफ है। एक जप माला में 108 मोती होते है सो इसी कारण मंदिर में 108 कमरे हैं। भगवान शिव के 1008 नामों के अनुरूप आकृतियां मंदिर की दीवारों पर बनायी गयी हैं। पाली जिले में शिव मंदिरों की सूची में गहरा प्रभाव डालने के लिए स्वामीजी ने मंदिर में 12 ज्योतिर्लिंग भी स्थापित किये हैं। इन ज्योतिलिंगो को देश की 12 पवित्र नदियों के जल से जलाभिषेक कर स्थापित किया गया है ताकि ज्योतिर्लिंग जागृत हो सके।
वैदिक वास्तुशास्त्र का उपयोग मंदिर के हर कोने को बनाने के लिए इस्तेमाल किया गया है। इसीलिए मंदिर का हर कमरा ब्रह्मांडीय ऊर्जा शक्ति सोख सके यह ध्यान में रख कर बनाया गया है।
इस नव निर्मित मंदिर की मूर्तियाँ ओडिशा के कारीगरों द्वारा बनाई गई हैं। मध्य में गुरु माधवानन्द की समाधि है। ऊपरी भाग में महादेव लिंग रूप में विराजे हैं। यह लिंग स्फटिक का बना है और मंदिर की तीसरी मंजिल पर स्थित है। शिवलिंग के इस कक्ष की छत पर ब्रह्मांड की आकृति बनाई गई है। पवित्र "ॐ" चिन्ह में बिंदु दर्शाने के लिए एक 9 मंजिला इमारत बनाई गई है। बिंदु के ऊपर सूर्य मंदिर है। इसी मंदिर के नीचे पानी कि टँकी भी बनाई गई है। मंदिर भवन में एक पुस्तकालय, कॉन्फ्रेंस हॉल और दुकाने भी बनाई गई है।
स्वामी महेश्वरानंद जी महाराज के गुरु, ब्रह्मलीन पूज्य महाराज श्री स्वामी माधवानंद पुरी को पाली के गांव वासी शिव अवतार मानते थे। पाली के ॐ मंदिर को अद्वितीय बनाने के लिए स्वामी माधवानंद जी की समाधी के पास सप्त ऋषियों की मूर्तियां भी स्थापित की गई हैं। उन्हीं की प्रेरणा और आशीर्वाद से स्वामी महेश्वरानंद महाराज जी ने विश्वदीप गुरुकुल बनवाया था। दो सौ स्तम्भों को अलग-अलग देवी देवताओं की मूर्तियां उकेरी गई हैं।
चौबीस वर्षों में बने मंदिर के योगदान में स्वामीजी के विदेशी शिष्यों ने बड़ी अहम भूमिका निभाई है। इसीलिए बड़ी संख्या में विदेश में रह रहे सनातनी गुरुजी के मार्गदर्शन में धर्म प्रसार में भी जुटे हैं।
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| ॐ मंदिर लघु मॉडल |
कैसे पहुँचे:
ॐ मंदिर जाडन गांव में है। सबसे नजदीक पाली और मारवाड़ रेलवे स्टेशन है। यह दोनों स्टेशन भारत के अन्य शहरों से पूरी तरह जुड़े हुए हैं।
जोधपुर हवाई अड्डा सबसे करीबी हवाई अड्डा है।
मंदिर पहुँचने के लिए बस और प्राइवेट वाहन की सुविधा भी है।
✒️Swapnil. A
(नोट:- ब्लॉग में अधिकतर तस्वीरें गूगल से निकाली गई हैं।)
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गुरुवार, 27 जुलाई 2023
विश्व स्वरूपम शिव, नाथद्वार, राजस्थान
वीर महाराणाओं की पावन धरती राजस्थान पर दुनिया की सबसे विशाल औऱ ऊंची महादेव की मूर्ति बनाई गई है। राजस्थान के शहर राजसमंद में भोलेनाथ की इस विशाल काय मूर्ति को बनवाने वाले है, मिराज समूह के अध्यक्ष मदन पालीवाल और मूर्तिकार है नरेश कुमावत।
यहां महादेव की विशाल मूर्ति बनाने के पीछे नाथद्वार वासियों की एक मान्यता है। जब महादेव एक समय नाथद्वारा आये थे तो उन्हीने यही आसन ग्रहण किया था। देवों के देव महादेव की मूर्ति ध्यान मुद्रा में है। और भला भोलेनाथ अपनी सवारी नन्दी के बिना कैसे दिख सकते हैं? सो नन्दी की मूर्ति पास ही मानो नृत्य करती हुई मुद्रा में दिखती है।
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| विश्व स्वरूपम |
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| विश्व स्वरूपम पीछे से |
प्रक्रिया औऱ सामग्री:
विश्व स्वरूपम(Statue of Belief) राजसमंद की गणेश टेकरी पहाड़ी पर बनाया गया है।
मूर्ति का काम 2018 में शुरू हुआ और लोकार्पण 29 अक्टूबर 2023 को राजस्थान के मुख्यमंत्री जी द्वारा करवाया गया। मूर्ति की ऊँचाई पहले 251 फ़ीट रखी गयी थी किंतु गंगा की जलधारा जोड़ने के चलते ऊंचाई 369 फ़ीट कर दी गयी। मूर्ति का आधार110 फ़ीट में पसरा है। कुल वजन 30000 टन है जो इसे एशिया की किसी भी मूर्ति से सबसे भारी और ऊंची करती है। तांबे का पेंट से रँगी मूर्ति अगले 20 वर्ष तक चमकती रहेगी। मूर्तिकार नरेश कुमावत बताते हैं की मूर्ति अगले 2500 साल तक यूं कि यूं बनी रहेगी चाहे कोई भी प्राकृतिक आपदा क्यों ना आ जाए। मूर्ति बनाने में कुल 30000 टन धातु(पंच धातु) जिसमे 2,600 टन स्टील 2,601 टन लोहा 26,618 क्यूबिक मीटर सीमेंट कंक्रीट 30x25 मीटर उपयोग हुआ है। नन्दी महाराज की ऊंचाई 25 फ़ीट और चौड़ाई 37 फीट की है। मूर्ति का ऊपरी भाग 250किमी तक तेज चलनेवाली हवाओं को भी झेलने की क्षमता रखता है। मूर्ति को बनाने में 90 इंजीनियरों औऱ 900 कारीगरों ने बनाकर तैयार किया है। मूर्त्ति के ऊपरी हिस्से में जाने के लिए 4 लिफ्ट, एक एलेवेटर और 3 कांच सीढ़ियों की व्यवस्था है। श्रद्धालुओं के लिए अंदर एक हॉल की व्यवस्था भी की गई है।
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| रात्री शिव दर्शन |
महादेव की जटाओं वाले भाग पर दो पानी की टँकीयां लगी है। एक टँकी जलाभिषेक के लिए और दूसरी आपातकाल के लिए। लगाई गई है। मूर्ति के भीतर कुल 15000 लोगों को लेने की क्षमता है। एक दिन में केवल 700 लोग को ही महादेव के अंदर के दर्शन की अनुमति है। एक बार में 60 लोगों को प्रवेश मिलेगा और 10-10 लोगों के जत्थे प्रवेश करते हैं।
विश्व स्वरूपम मूर्ति को पूरा देखने में दर्शनार्थियों को कम से कम 4 घंटों का समय लगेगा। मूर्ति के ऊपर पहुँचने पर राजसमंद शहर का लुभावना दृश्य देखते ही बनता है।
मूर्ति दर्शन समय:
- सुबह 5 से 12:30 बजे तक
- दोपहर 3 से रात्री 8:30 बजे तक
कैसे पहुँचे:
हवाई मार्ग- राजसमंद से सबसे नजदीकी एयरपोर्ट उदयपुर का महाराणा प्रताप एयरपोर्ट है जो विश्व स्वरूपम मूर्ति से 57 किमी दूर है।
रेल मार्ग- राजसमंद से सबसे नजदीकी रेलवे स्टेशन मावली रेलवे स्टेशन है। विश्व स्वरूपम मूर्ति की स्टेशन से दूरी कुल 29.9 किमी दूर है।
✒️Swapnil. A
(नोट:- ब्लॉग में अधिकतर तस्वीरें गूगल से निकाली गई हैं।)
अधिक जानकारी के लिए नीचे दिए गए लिंक्स पर क्लिक करें:-
http//hindi.revoi.in/369-feet-high-shiva-statue-vishvas-swaroopam-inaugurated-in-nathdwara-rajasthan/amp/
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शनिवार, 20 मई 2023
भेरूजी नाथ मंदिर, कोडमदेसर , बीकानेर, राजस्थान
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तनोट राय माता मंदिर, जैसलमेर, राजस्थान
भारत-पाक सीमा पर तनोट राय माता मंदिर लगभग 1300 वर्षो से स्थापित है जिसकी आध्यात्मिक शक्ति का परिचय सन् 1965 और 1971 के युद्ध के समय शत्रु दे...
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भारत-पाक सीमा पर तनोट राय माता मंदिर लगभग 1300 वर्षो से स्थापित है जिसकी आध्यात्मिक शक्ति का परिचय सन् 1965 और 1971 के युद्ध के समय शत्रु दे...
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यूं तो भगवान श्रीराम भक्त हनुमान के देश में कई और विदेशों में कुछ मंदिर है, किंतु भारत के गांवों दराजों में ऐसे मंदिर है जिनकी खबर किसी को...
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दतिया शहर एक आध्यात्मिक नगरी है। पीताम्बरा पीठ को मध्यप्रदेश का छोटा-वृंदावन भी कहा जाता है। यहां साल भर भक्त अपने कार्यों की सिद्धि के लिए ...









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